80 साल बाद भी सरकारी स्कूल बदहाल क्यों? अभिजीत दीपके ने शिक्षा मंत्रियों से मांगा 6 सवालों का जवाब
अभिजीत दीपके ने राज्यों के शिक्षा मंत्रियों से पिछले पांच वर्षों का विस्तृत रिकॉर्ड साझा करने की मांग की है। उन्होंने पूछा है कि राज्य में पिछले पांच साल के दौरान कितने सरकारी स्कूलों का कायाकल्प किया गया और वर्तमान में कितने स्कूल ऐसे हैं जिन्हें तत्काल मरम्मत या पूरी तरह से कायाकल्प की जरूरत है। उन्होंने सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की स्थिति पर भी स्पष्ट आंकड़े मांगे हैं। सवाल है कि इस समय कितने शिक्षण पद स्वीकृत हैं, उनमें से कितने पदों पर नियुक्तियां हो चुकी हैं और कितने पद अभी भी खाली पड़े हैं।
नई दिल्ली: देश की आजादी के 80 साल पूरे होने के बावजूद सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति को लेकर अब सीधे राज्य सरकारों से जवाब मांगने की आवाज तेज हो गई है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के फाउंडर अभिजीत दीपके ने देश के सभी राज्यों के शिक्षा मंत्रियों को चिट्ठी लिखकर सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति से जुड़ी छह अहम जानकारियां सार्वजनिक करने की मांग की है।
दीपके ने सवाल उठाया है कि जब शिक्षा को देश के भविष्य की नींव माना जाता है, तो आखिर सरकारी स्कूलों में बच्चों को आज भी साफ पीने का पानी, इस्तेमाल योग्य शौचालय, बेहतर क्लासरूम और बैठने के लिए पर्याप्त बेंच जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए क्यों जूझना पड़ रहा है?
उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर सरकारी स्कूलों की जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे सिर्फ किसी एक स्कूल की समस्या नहीं हैं, बल्कि व्यवस्था की गंभीर कमियों की ओर इशारा करती हैं। बच्चों को ऐसी परिस्थितियों में पढ़ने के लिए मजबूर करना बेहद चिंताजनक है।
शिक्षा मंत्रियों से मांगा छह बिंदुओं पर पूरा हिसाब
अभिजीत दीपके ने राज्यों के शिक्षा मंत्रियों से पिछले पांच वर्षों का विस्तृत रिकॉर्ड साझा करने की मांग की है। उन्होंने पूछा है कि राज्य में पिछले पांच साल के दौरान कितने सरकारी स्कूलों का कायाकल्प किया गया और वर्तमान में कितने स्कूल ऐसे हैं जिन्हें तत्काल मरम्मत या पूरी तरह से कायाकल्प की जरूरत है।
उन्होंने सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की स्थिति पर भी स्पष्ट आंकड़े मांगे हैं। सवाल है कि इस समय कितने शिक्षण पद स्वीकृत हैं, उनमें से कितने पदों पर नियुक्तियां हो चुकी हैं और कितने पद अभी भी खाली पड़े हैं।
इसके साथ ही उन्होंने पिछले पांच वर्षों में सरकारी स्कूलों के लिए जारी किए गए बजट और वास्तविक खर्च का भी पूरा ब्यौरा मांगा है। यानी सरकार ने स्कूलों के लिए कितना पैसा तय किया और उसमें से वास्तव में कितना खर्च हुआ, इसका हिसाब सामने आना चाहिए।
हर बच्चे के लिए पर्याप्त स्कूल हैं या नहीं?
दीपके ने राज्यों से यह भी बताने को कहा है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए मौजूदा स्कूलों के अलावा कितने नए सरकारी स्कूलों की आवश्यकता है। उनका सवाल सीधे तौर पर स्कूलों की संख्या और बच्चों की शिक्षा तक पहुंच से जुड़ा है।
उन्होंने शिक्षकों से कराए जा रहे गैर-शैक्षणिक कार्यों पर भी जानकारी मांगी है। पढ़ाने के अलावा सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को किन-किन नॉन-टीचिंग जिम्मेदारियों में लगाया जाता है, इसका भी पूरा विवरण मांगा गया है।
छठे सवाल में उन्होंने स्कूलों में उपलब्ध आधुनिक और बुनियादी सुविधाओं का आंकड़ा मांगा है। इसमें कंप्यूटर और डिजिटल लर्निंग की सुविधा, साफ और उपयोग में आने वाले शौचालय तथा बच्चों के लिए खेल सुविधाएं और खेल उपकरण शामिल हैं।
“बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार स्वीकार नहीं किया जा सकता”
दीपके ने सरकारी स्कूलों की वायरल हो रही तस्वीरों को लेकर तीखी चिंता जताई है। उनका कहना है कि स्कूलों की ऐसी हालत को सामान्य मानकर आगे नहीं बढ़ा जा सकता। जिन बच्चों के हाथों में देश का भविष्य है, उन्हें जर्जर और असुविधाजनक माहौल में पढ़ने के लिए मजबूर करना व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
उन्होंने यहां तक कहा कि कई जगह स्कूलों में बच्चों के साथ जानवरों से भी बदतर परिस्थितियों में व्यवहार किया जा रहा है। उनका सवाल है कि आखिर सरकारें शिक्षा व्यवस्था की बुनियादी कमियों को कब तक नजरअंदाज करती रहेंगी?
अब गेंद राज्यों के शिक्षा मंत्रियों के पाले में है। दीपके की चिट्ठी ने सरकारी स्कूलों की मरम्मत, शिक्षक भर्ती, बजट खर्च, स्कूलों की जरूरत और डिजिटल सुविधाओं जैसे मुद्दों पर सरकारों से आंकड़ों के साथ जवाब देने की मांग सामने रख दी है। सवाल सिर्फ स्कूलों का नहीं, बल्कि उन करोड़ों बच्चों के भविष्य का है जो सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर हैं।
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