दिल्ली की सियासत के चर्चित चेहरे का अंत: 1984 दंगों के दोषी सज्जन कुमार का निधन
सजा के बाद सज्जन कुमार ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उनका राजनीतिक करियर लगभग पूरी तरह समाप्त हो गया। 2025 में एक और मामले में उम्रकैद मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। फरवरी 2025 में दिल्ली की एक अदालत ने 1984 के दंगों के दौरान दो सिखों की हत्या से जुड़े एक अन्य मामले में भी सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा सुनाई। उन्हें अप्रैल 2022 में दंगों से जुड़े एक मामले में जमानत मिली थी, लेकिन दूसरे मामले में दोषी ठहराए जाने के कारण उनकी जेल से रिहाई नहीं हो सकी। इस तरह वह करीब सात वर्षों से तिहाड़ जेल में बंद थे।
नई दिल्ली: 1984 के सिख-विरोधी दंगों के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार का गुरुवार को 80 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। तिहाड़ जेल में बंद सज्जन कुमार की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
तीन बार लोकसभा सांसद रहे सज्जन कुमार कभी दिल्ली की राजनीति में कांग्रेस के प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते थे। बाहरी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से राजनीति करने वाले कुमार की पहचान खास तौर पर जाट समुदाय के एक मजबूत नेता के तौर पर बनी थी। हालांकि, 1984 के सिख-विरोधी दंगों से जुड़े मामलों ने उनके राजनीतिक जीवन की दिशा पूरी तरह बदल दी।
1984 के दंगों ने बदल दी राजनीतिक तस्वीर
31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या के बाद दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में हिंसा भड़क उठी थी। अगले कई दिनों तक सिख समुदाय के लोगों को निशाना बनाया गया। घरों, दुकानों और गुरुद्वारों में आगजनी की गई और बड़ी संख्या में लोगों की हत्या हुई।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अकेले दिल्ली में करीब 3,000 लोगों की जान गई थी। हालांकि, पीड़ित परिवारों और विभिन्न संगठनों की ओर से मृतकों की संख्या इससे कहीं अधिक होने का दावा किया जाता रहा।
तीन दशक बाद फिर खुली जांच की फाइल
दंगों के बाद सज्जन कुमार पर हिंसा भड़काने और भीड़ को उकसाने के आरोप लगे, लेकिन लंबे समय तक उनके खिलाफ कोई ठोस कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकी। कई जांच आयोगों और पैनलों की रिपोर्टों में भी उनका नाम प्रमुख आरोपी के तौर पर सामने नहीं आया।
करीब तीन दशक बाद 2015 में केंद्र सरकार ने 1984 के दंगों से जुड़े बंद मामलों की दोबारा जांच के लिए विशेष जांच दल यानी SIT का गठन किया। इसके बाद पुराने मामलों की फाइलें फिर खुलीं और सज्जन कुमार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई तेज हुई।
2018 में मिली पहली बड़ी सजा
सज्जन कुमार के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा मोड़ 17 दिसंबर 2018 को आया। दिल्ली हाई कोर्ट ने पालम कॉलोनी इलाके में पांच सिखों की हत्या और एक गुरुद्वारे में आगजनी के मामले में उन्हें दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।
सजा के बाद सज्जन कुमार ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उनका राजनीतिक करियर लगभग पूरी तरह समाप्त हो गया।
2025 में एक और मामले में उम्रकैद
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। फरवरी 2025 में दिल्ली की एक अदालत ने 1984 के दंगों के दौरान दो सिखों की हत्या से जुड़े एक अन्य मामले में भी सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा सुनाई।
उन्हें अप्रैल 2022 में दंगों से जुड़े एक मामले में जमानत मिली थी, लेकिन दूसरे मामले में दोषी ठहराए जाने के कारण उनकी जेल से रिहाई नहीं हो सकी। इस तरह वह करीब सात वर्षों से तिहाड़ जेल में बंद थे।
पत्नी से मिलने की भी नहीं मिली थी जमानत
इस वर्ष अप्रैल में सज्जन कुमार ने अपनी बीमार पत्नी से मिलने के लिए सुप्रीम कोर्ट से जमानत की मांग की थी। हालांकि, अदालत ने उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया था।
अब 80 वर्ष की उम्र में उनके निधन के साथ दिल्ली की राजनीति के एक ऐसे अध्याय का अंत हो गया है, जिसकी शुरुआत सत्ता और प्रभाव से हुई थी, लेकिन जिसका सबसे गहरा संबंध देश के सबसे दर्दनाक साम्प्रदायिक हिंसा के अध्यायों में से एक से जुड़ गया।
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