एक ही ब्रांड, लेकिन स्वाद और सेहत में कितना फर्क? भारत में पैकेज्ड फूड के दोहरे मानकों पर बड़ा सवाल

भारत में भी फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग को लेकर वर्षों से बहस चल रही है। प्रस्तावित व्यवस्थाओं में स्टार रेटिंग और रंगीन चेतावनी जैसे विकल्प शामिल रहे हैं। हालांकि, भारत में अभी तक ऐसा स्पष्ट चेतावनी सिस्टम लागू नहीं हुआ है, जिस तरह कुछ अन्य देशों में दिखाई देता है। मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच चुका है। अदालत में स्वास्थ्य विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं की ओर से यह सवाल उठाया गया है कि उपभोक्ताओं को खाद्य पदार्थों के संभावित स्वास्थ्य प्रभावों की जानकारी सरल और स्पष्ट तरीके से मिलनी चाहिए। दांव सिर्फ लेबल का नहीं, स्वास्थ्य का है भारत में मोटापा, डायबिटीज और अन्य जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। ऐसे में पैकेज्ड फूड पर स्पष्ट पोषण जानकारी सिर्फ उपभोक्ता अधिकार का मुद्दा नहीं, बल्कि पब्लिक हेल्थ का सवाल भी बन गया है।

Aug 25, 2026 - 16:38
एक ही ब्रांड, लेकिन स्वाद और सेहत में कितना फर्क? भारत में पैकेज्ड फूड के दोहरे मानकों पर बड़ा सवाल

एक ही कंपनी, एक ही ब्रांड और लगभग एक जैसी पैकेजिंग—लेकिन भारत और विदेशों में बिकने वाले कई पैकेज्ड फूड प्रोडक्ट्स की रेसिपी, सामग्री और लेबलिंग में बड़ा अंतर देखने को मिलता है। सवाल सिर्फ स्वाद का नहीं, बल्कि उपभोक्ता की सेहत और उसे मिलने वाली जानकारी का भी है।

फैंटा से समझिए फर्क

ब्रिटेन में बिकने वाली फैंटा और भारत में बिकने वाली फैंटा की पोषण संरचना में अंतर को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। यूरोप में कुछ आर्टिफिशियल कलर्स वाले उत्पादों पर पैकेज के सामने स्पष्ट चेतावनी दी जाती है, जबकि भारत में ऐसी जानकारी आमतौर पर पीछे छोटे अक्षरों में दी जाती है।

चॉकलेट में कोको का अंतर

किटकैट जैसे लोकप्रिय उत्पादों को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की तुलना सामने आती रही है। भारत में बिकने वाले कुछ वर्जन में कोको सॉलिड की मात्रा कम होने और ऑस्ट्रेलियाई वर्जन में अधिक होने की बात कही जाती है। इससे सवाल उठता है कि अलग-अलग बाजारों के लिए एक ही ब्रांड की रेसिपी कितनी बदलती है।

मैगी पर भी उठे सवाल

मैगी के मामले में भी भारत और ब्रिटेन के पैकेजिंग नियमों का अंतर चर्चा में रहा है। ब्रिटेन में बिकने वाले कई पैकेटों पर फ्रंट-ऑफ-पैक न्यूट्रिशन लेबल के जरिए नमक, चीनी और फैट की मात्रा को आसानी से समझने योग्य तरीके से दिखाया जाता है। भारत में उपभोक्ता को इसी जानकारी के लिए पैकेट पलटकर पीछे लिखी पोषण तालिका देखनी पड़ती है।

बेबी फूड से जुड़ा विवाद

नेस्ले के सेरेलैक को लेकर भी भारत में लंबे समय तक बहस होती रही। 2024 में कंपनी ने भारत में बिना अतिरिक्त चीनी वाले सेरेलैक वर्जन की पेशकश शुरू की। इससे पहले भारत में उपलब्ध उत्पादों में अतिरिक्त चीनी को लेकर सवाल उठते रहे थे।

कंपनियों का तर्क क्या है?

कंपनियों का कहना है कि हर देश का स्वाद, उपभोक्ता व्यवहार, कीमत और स्थानीय नियम अलग होते हैं, इसलिए उत्पादों की रेसिपी में बदलाव जरूरी हो सकता है। उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, कीमत नियंत्रित रखने के लिए कच्चे माल का चुनाव भी अलग हो सकता है।

लेकिन असली सवाल यहीं से उठता है—क्या कीमत और स्थानीय स्वाद के नाम पर उपभोक्ता को महत्वपूर्ण पोषण संबंधी जानकारी कम दिखाई देनी चाहिए?

भारत में फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग की लड़ाई

दुनिया के कई देशों में पैकेज के सामने ही रंगों या चेतावनी संकेतों के जरिए बताया जाता है कि किसी खाद्य पदार्थ में चीनी, नमक या फैट की मात्रा अधिक है।

भारत में भी फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग को लेकर वर्षों से बहस चल रही है। प्रस्तावित व्यवस्थाओं में स्टार रेटिंग और रंगीन चेतावनी जैसे विकल्प शामिल रहे हैं। हालांकि, भारत में अभी तक ऐसा स्पष्ट चेतावनी सिस्टम लागू नहीं हुआ है, जिस तरह कुछ अन्य देशों में दिखाई देता है।

मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच चुका है। अदालत में स्वास्थ्य विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं की ओर से यह सवाल उठाया गया है कि उपभोक्ताओं को खाद्य पदार्थों के संभावित स्वास्थ्य प्रभावों की जानकारी सरल और स्पष्ट तरीके से मिलनी चाहिए।

दांव सिर्फ लेबल का नहीं, स्वास्थ्य का है

भारत में मोटापा, डायबिटीज और अन्य जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। ऐसे में पैकेज्ड फूड पर स्पष्ट पोषण जानकारी सिर्फ उपभोक्ता अधिकार का मुद्दा नहीं, बल्कि पब्लिक हेल्थ का सवाल भी बन गया है।

तब तक ग्राहक क्या करें?

जब तक पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी नहीं आती, उपभोक्ताओं को खुद सतर्क रहना होगा।

पैकेट खरीदने से पहले तीन चीजें जरूर देखें—

100 ग्राम में कितनी चीनी है।
नमक/सोडियम की मात्रा कितनी है।
किस प्रकार का तेल या फैट इस्तेमाल हुआ है।

इसके अलावा सामग्री सूची भी ध्यान से पढ़ें। जो सामग्री सूची में सबसे पहले लिखी होती है, उसकी मात्रा आमतौर पर सबसे अधिक होती है।

आखिर सवाल यह नहीं है कि भारत में बिकने वाला हर उत्पाद खराब है या विदेश का हर उत्पाद बेहतर। असली सवाल है—क्या भारतीय उपभोक्ता को भी वही स्पष्ट और आसानी से समझ आने वाली जानकारी मिलनी चाहिए, जो दुनिया के कई दूसरे बाजारों में दी जा रही है?

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