नासिक कुंभ के ₹34,000 करोड़ पर सुप्रीम कोर्ट के जज का सवाल: “सिर्फ 0.1% शिक्षा पर खर्च होता तो बच जाते 125 मराठी स्कूल!”

उनकी टिप्पणी का सार यही था कि हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाओं के बीच अगर सिर्फ 0.1 फीसदी राशि भी सरकारी स्कूलों के लिए निकाल दी जाए, तो सैकड़ों नहीं तो कम से कम 100-125 मराठी माध्यम के स्कूलों को बंद होने से बचाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा सकता है।

Aug 24, 2026 - 16:22
नासिक कुंभ के ₹34,000 करोड़ पर सुप्रीम कोर्ट के जज का सवाल: “सिर्फ 0.1% शिक्षा पर खर्च होता तो बच जाते 125 मराठी स्कूल!”

मुंबई: महाराष्ट्र में शिक्षा के घटते बजट और बंद होते मराठी माध्यम के स्कूलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने बेहद गंभीर टिप्पणी की है। धुले में एक हाई स्कूल में ‘स्मार्ट क्लासेस’ के उद्घाटन समारोह में उन्होंने नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेले के लिए प्रस्तावित हजारों करोड़ रुपये के बजट और राज्य की स्कूली शिक्षा की स्थिति के बीच बड़ा सवाल खड़ा किया।

जस्टिस वराले ने कहा कि नासिक कुंभ के लिए 32,000 से 34,000 करोड़ रुपये तक का प्रावधान किया जा रहा है, जबकि इस राशि का महज 0.1 फीसदी यानी करीब 32-34 करोड़ रुपये शिक्षा पर खर्च किए जाएं तो महाराष्ट्र के 100 से 125 बंद हो चुके मराठी माध्यम के स्कूलों को बचाया जा सकता था।

उन्होंने साफ किया कि उन्हें विकास परियोजनाओं या बड़े आयोजनों पर सरकारी खर्च से कोई आपत्ति नहीं है। उनका सवाल प्राथमिकताओं को लेकर है। उन्होंने कहा कि जब सरकार हजारों करोड़ रुपये के मेगा प्रोजेक्ट्स और कॉरिडोर पर खर्च कर सकती है, तो बुनियादी शिक्षा और सरकारी स्कूलों के लिए पर्याप्त संसाधन क्यों नहीं उपलब्ध कराए जा रहे हैं?

“शिक्षा का बजट बढ़ने के बजाय घट रहा है”

जस्टिस वराले ने महाराष्ट्र में शिक्षा के बजट में कमी पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि छात्रों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन इसके बावजूद शिक्षा के लिए आवंटित बजट लगातार अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पा रहा है। कई वर्षों से यह राज्य के कुल बजट का 13 फीसदी तक भी नहीं पहुंचा है।

उन्होंने कहा कि सरकारी स्कूल केवल इमारतें नहीं हैं, बल्कि वे उन लाखों बच्चों के भविष्य का आधार हैं, जिनके परिवार महंगी निजी शिक्षा का खर्च वहन नहीं कर सकते।

जज ने सुनाया अपना अनुभव

जस्टिस वराले ने क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा के महत्व को अपने व्यक्तिगत अनुभव से भी जोड़ा। उन्होंने बताया कि उन्होंने कक्षा 10वीं तक की पढ़ाई म्यूनिसिपल और जिला परिषद के मराठी माध्यम के स्कूलों से की है।

उन्होंने कहा कि मराठी माध्यम से पढ़ाई करने से उनके करियर में कोई बाधा नहीं आई। इसके उलट, क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा ने उनकी सोच को व्यापक बनाने में मदद की।

आश्रम स्कूल की घटना का किया जिक्र

ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी पर चिंता जताते हुए जस्टिस वराले ने एक आश्रम स्कूल की दर्दनाक घटना का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि पर्याप्त सुविधाएं नहीं होने के कारण जमीन पर सो रही तीन छात्राओं की सांप के काटने से मौत हो गई थी।

यह उदाहरण देते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि यदि स्कूलों में बच्चों के लिए बुनियादी सुरक्षा और सुविधाएं तक सुनिश्चित नहीं की जा रही हैं, तो विकास का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है?

कुंभ, कॉरिडोर और स्कूलों के बीच खर्च का सवाल

जस्टिस वराले ने नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ के साथ-साथ कॉरिडोर और अन्य बड़ी विकास परियोजनाओं पर होने वाले भारी सार्वजनिक खर्च का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि कॉरिडोर परियोजनाओं के लिए भी करीब ₹11,000 करोड़ तक का आवंटन किया जा रहा है।

उनका कहना था कि सरकार को विकास कार्य करने चाहिए और बड़े आयोजनों पर खर्च भी करना चाहिए, लेकिन इसके साथ यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि शिक्षा जैसे बुनियादी क्षेत्र पीछे न छूट जाएं।

उनकी टिप्पणी का सार यही था कि हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाओं के बीच अगर सिर्फ 0.1 फीसदी राशि भी सरकारी स्कूलों के लिए निकाल दी जाए, तो सैकड़ों नहीं तो कम से कम 100-125 मराठी माध्यम के स्कूलों को बंद होने से बचाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा सकता है।

जस्टिस वराले की यह टिप्पणी महाराष्ट्र में विकास की प्राथमिकताओं, क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा और सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ सकती है।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow