नम आँखों से सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश पादरीवाला ने सुनाया देश का पहला ‘इच्छा मृत्यु’ फैसला, हरीश राणा के माता-पिता की गुहार हुई मंजूर

लेकिन कल्पना कीजिए उस क्षण की, जब वही माँ-बाप अदालत के सामने खड़े होकर कहते हैं— “हमारे बेटे को इस असहनीय पीड़ा से मुक्ति दे दीजिए।” यह वाक्य जितना सरल सुनाई देता है, उसके पीछे उतना ही गहरा दर्द छिपा होता है। यह उन अनगिनत रातों का सच है, जब एक माँ ने अपने बेटे को दर्द से कराहते हुए देखा होगा और खुद को असहाय महसूस किया होगा। यह उस पिता की मजबूरी है, जिसने हर संभव कोशिश की होगी कि उसका बच्चा ठीक हो जाए, लेकिन जब हर उम्मीद धीरे-धीरे टूटने लगे, तो शायद इंसान को अपने ही दिल के खिलाफ फैसला लेना पड़ता है।

Mar 11, 2026 - 13:35
नम आँखों से सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश पादरीवाला ने सुनाया देश का पहला ‘इच्छा मृत्यु’ फैसला, हरीश राणा के माता-पिता की गुहार हुई मंजूर

हम अक्सर अपने जीवन के दुखों को ही सबसे बड़ा मान बैठते हैं। नौकरी का तनाव, पैसों की कमी, रिश्तों की उलझनें—इन सबके बीच हमें लगता है कि शायद हमारी ही जिंदगी सबसे ज्यादा कठिन है। लेकिन कभी-कभी जीवन हमें ऐसी कहानियों से रूबरू कराता है, जो हमारे सारे दुखों को बहुत छोटा बना देती हैं।

हाल ही में एक ऐसा ही मामला सामने आया, जहाँ एक परिवार को अपने ही बेटे के लिए इच्छा मृत्यु की अनुमति माँगनी पड़ी।
यह केवल एक कानूनी मामला नहीं है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं की गहराई को झकझोर देने वाली कहानी है।

माता-पिता के लिए संतान केवल एक रिश्ता नहीं होती। वह उनके जीवन का सबसे बड़ा सपना होती है। जब एक बच्चा जन्म लेता है, तो उसके साथ ही माँ की आँखों में अनगिनत उम्मीदें जन्म लेती हैं और पिता के दिल में उसके भविष्य के सपने बस जाते हैं। माता-पिता का पूरा जीवन अपने बच्चे को बेहतर भविष्य देने की कोशिश में बीत जाता है।

लेकिन कल्पना कीजिए उस क्षण की, जब वही माँ-बाप अदालत के सामने खड़े होकर कहते हैं—
“हमारे बेटे को इस असहनीय पीड़ा से मुक्ति दे दीजिए।”

यह वाक्य जितना सरल सुनाई देता है, उसके पीछे उतना ही गहरा दर्द छिपा होता है।
यह उन अनगिनत रातों का सच है, जब एक माँ ने अपने बेटे को दर्द से कराहते हुए देखा होगा और खुद को असहाय महसूस किया होगा।
यह उस पिता की मजबूरी है, जिसने हर संभव कोशिश की होगी कि उसका बच्चा ठीक हो जाए, लेकिन जब हर उम्मीद धीरे-धीरे टूटने लगे, तो शायद इंसान को अपने ही दिल के खिलाफ फैसला लेना पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छा मृत्यु की अनुमति देते हुए यह कहा कि पूरी प्रक्रिया गरिमा और सम्मान के साथ पूरी की जानी चाहिए। सुनवाई के दौरान अदालत ने परिवार से भी बातचीत की और जस्टिस पारदीवाला ने माना कि यह बेहद दुखद स्थिति है। उन्होंने कहा कि यह फैसला लेना आसान नहीं है, लेकिन किसी इंसान को अंतहीन पीड़ा में तड़पते हुए जीने के लिए मजबूर करना भी मानवता के खिलाफ है।

यहाँ सवाल केवल कानून का नहीं है, बल्कि इंसानियत का भी है।
कानून हमेशा जीवन की रक्षा के लिए खड़ा रहता है, क्योंकि हर जीवन अनमोल है। लेकिन जब वही जीवन लगातार दर्द और असहायता में बदल जाए, तब न्याय को भी संवेदनाओं के साथ रास्ता तलाशना पड़ता है।

यही वह बिंदु है जहाँ समाज को भी ठहरकर सोचना चाहिए—
क्या जीवन केवल साँस लेने का नाम है?
या जीवन का अर्थ यह भी है कि इंसान को सम्मान और गरिमा के साथ जीने का अधिकार मिले?

जब हर साँस एक संघर्ष बन जाए, जब हर दिन किसी यातना से कम न लगे, तब शायद करुणा का सबसे बड़ा रूप यही होता है कि इंसान को उस दर्द से मुक्ति दे दी जाए।

लेकिन इस पूरी कहानी में सबसे गहरी चोट अदालत के फैसले में नहीं है।
सबसे गहरी चोट उस माँ के दिल में है, जिसने अपने बेटे को नौ महीने अपनी कोख में रखा था।
सबसे गहरी चोट उस पिता की आँखों में है, जिसने अपने बेटे के साथ अनगिनत सपने देखे थे।

किसी भी माँ-बाप के लिए यह कल्पना भी असहनीय होती है कि उनका बच्चा उनसे पहले इस दुनिया से चला जाए। हर माता-पिता यही चाहते हैं कि उनका बच्चा उनसे भी लंबी उम्र जिए, खुश रहे, अपने सपनों को पूरा करे। लेकिन जब परिस्थितियाँ इतनी क्रूर हो जाएँ कि जीवन ही एक अंतहीन पीड़ा में बदल जाए, तब शायद माता-पिता को अपने दिल के सबसे कठिन फैसले से गुजरना पड़ता है।

यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज के लिए एक गहरी सीख भी है।
यह हमें याद दिलाती है कि जीवन की असली कीमत केवल उसके होने में नहीं, बल्कि उसके सम्मान और गरिमा में भी है।

आज के समय में, जब हम अक्सर अपने छोटे-छोटे दुखों को ही सबसे बड़ा मान लेते हैं, यह घटना हमें ठहरकर सोचने के लिए मजबूर करती है।
हम जिन समस्याओं को बहुत बड़ा समझते हैं, वे शायद जीवन के सामने उतनी बड़ी नहीं होतीं।

सच्चाई यह है कि जीवन बहुत अनमोल है। लेकिन जीवन का सम्मान तभी है जब उसमें पीड़ा से मुक्ति और गरिमा का अधिकार भी हो।

और शायद यही कारण है कि अदालत ने भी इस फैसले को केवल कानूनी दृष्टि से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के साथ देखा।

अंत में यही सवाल हमारे सामने खड़ा रहता है—
दुनिया में दुख के कई रूप होते हैं, लेकिन शायद इससे बड़ा दुख कोई नहीं होगा कि एक माँ-बाप को अपने ही बच्चे के लिए जीवन नहीं, बल्कि मृत्यु की दुआ माँगनी पड़े।

यह केवल एक फैसला नहीं है।
यह उस दर्द की कहानी है, जिसे समझने के लिए केवल कानून नहीं, बल्कि एक संवेदनशील दिल की भी ज़रूरत होती है।

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