थाली महंगी, जेब खाली… फिर किसके आए ‘अच्छे दिन’? महंगाई पर कांग्रेस का मोदी सरकार से सवाल प्याज, लहसुन से लेकर अदरक और नींबू तक की कीमतों में उछाल ; जयराम रमेश बोले—‘अब प्रधानमंत्री के लिए झोला उठाने का वक्त आ गया है।’
एक परिवार जब राशन, बच्चों की पढ़ाई, आने-जाने, कपड़ों और घर के दूसरे खर्चों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है, तो हर बढ़ी हुई कीमत उसके बजट को दोबारा लिखने पर मजबूर करती है। कहीं बचत कम होती है, कहीं जरूरतें टलती हैं और कहीं महीने के आखिर में उधार लेना पड़ता है। यही वह दबाव है, जिसे महंगाई के प्रतिशत से आगे जाकर समझने की जरूरत है। जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि महंगाई के कारण गरीब परिवारों की थाली प्रभावित हो रही है, जबकि मध्यम वर्ग की बचत पर दबाव बढ़ रहा है। उन्होंने सरकार पर ‘अच्छे दिन’ के वादे को लेकर भी सवाल उठाए और ‘वोट चोरी’ के अपने राजनीतिक आरोप के साथ ‘बचत चोरी’ का तंज कसा।
थाली महंगी, जेब खाली… फिर किसके आए ‘अच्छे दिन’? महंगाई पर कांग्रेस का मोदी सरकार से सवाल
प्याज, लहसुन से लेकर अदरक और नींबू तक की कीमतों में उछाल का दावा; जयराम रमेश बोले—‘अब प्रधानमंत्री के लिए झोला उठाने का वक्त आ गया है।’
महंगाई का असली चेहरा किसी सरकारी रिपोर्ट में नहीं, बल्कि आम आदमी की रसोई में दिखाई देता है। महीने का बजट वही है, कमाई लगभग उतनी ही है, लेकिन बाजार से लौटते वक्त थैले में सामान कम और बिल पहले से ज्यादा होता जा रहा है। सवाल सिर्फ कीमतों के बढ़ने का नहीं, बल्कि उस भरोसे का भी है, जिसके साथ जनता ने बेहतर दिनों की उम्मीद की थी।
कांग्रेस ने इसी मुद्दे को लेकर मंगलवार को केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने खुदरा और खाद्य महंगाई के आंकड़ों का हवाला देते हुए सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाए और तंज कसते हुए कहा कि प्रधानमंत्री के लिए अब ‘झोला उठाने का वक्त’ आ गया है।
रमेश के मुताबिक, सितंबर में खुदरा महंगाई बढ़कर 5.54 प्रतिशत और खाद्य महंगाई 7.74 प्रतिशत तक पहुंच गई। उन्होंने प्याज की कीमतों में 108 प्रतिशत, लहसुन में 55 प्रतिशत, अदरक में 63 प्रतिशत और नींबू में 36 प्रतिशत की बढ़ोतरी का हवाला दिया। इन आंकड़ों के जरिए कांग्रेस ने आरोप लगाया कि महंगाई का बोझ आम परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है।
लेकिन महंगाई की कहानी सिर्फ सब्जियों की कीमतों तक सीमित नहीं है।
एक परिवार जब राशन, बच्चों की पढ़ाई, आने-जाने, कपड़ों और घर के दूसरे खर्चों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है, तो हर बढ़ी हुई कीमत उसके बजट को दोबारा लिखने पर मजबूर करती है। कहीं बचत कम होती है, कहीं जरूरतें टलती हैं और कहीं महीने के आखिर में उधार लेना पड़ता है। यही वह दबाव है, जिसे महंगाई के प्रतिशत से आगे जाकर समझने की जरूरत है।
जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि महंगाई के कारण गरीब परिवारों की थाली प्रभावित हो रही है, जबकि मध्यम वर्ग की बचत पर दबाव बढ़ रहा है। उन्होंने सरकार पर ‘अच्छे दिन’ के वादे को लेकर भी सवाल उठाए और ‘वोट चोरी’ के अपने राजनीतिक आरोप के साथ ‘बचत चोरी’ का तंज कसा।
अब सवाल सरकार से भी है और व्यवस्था से भी।
क्या बढ़ती कीमतों के बीच आम आदमी की आय और बचत को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त कदम उठाए जा रहे हैं? क्या महंगाई के आंकड़ों के साथ यह भी बताया जाना चाहिए कि उसका बोझ अलग-अलग आय वर्गों के परिवारों पर कितना पड़ रहा है? और जब रसोई का बजट बिगड़ता है, तो राहत की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
कांग्रेस के आरोप राजनीतिक बहस का हिस्सा हैं, लेकिन आम आदमी की जेब पर पड़ने वाला दबाव एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर जवाबदेही और ठोस चर्चा जरूरी है। महंगाई पर बहस केवल सत्ता और विपक्ष के बयानों तक सिमट जाए, तो रसोई में बढ़ती कीमतों का सवाल पीछे छूट जाता है।
क्योंकि जनता के लिए ‘अच्छे दिन’ किसी नारे से नहीं, महीने के अंत में बची हुई रकम से तय होते हैं।
What's Your Reaction?






