‘दुपहिया’ सीजन 2 रिव्यू: धड़कपुर में इस बार सिर्फ बाइक नहीं, अफवाहों, सपनों और सिस्टम की भी सवारी है!
कहानी तब नया मोड़ लेती है जब बनवारी की जमीन पर मोबाइल टावर लगाने का प्रस्ताव आता है। बदले में लाखों रुपये और नियमित आमदनी की उम्मीद परिवार के लिए किसी वरदान से कम नहीं। लेकिन गांव में इंटरनेट से मिली आधी-अधूरी जानकारी के बाद अफवाहों का बाजार गर्म हो जाता है। किसी को लगता है मोबाइल टावर बीमारी फैलाएगा, कोई उसे बुखार का कारण बताता है तो कोई उससे सुनामी तक जोड़ देता है। यहां सीरीज सोशल मीडिया और अधकचरी जानकारी के उस दौर पर मजेदार कटाक्ष करती है, जहां जानकारी कम और राय ज्यादा होती है।
अगर इस वीकेंड खून-खराबे, भारी-भरकम ड्रामा और चकाचौंध से थोड़ा ब्रेक लेकर कुछ ठेठ देसी, हल्का-फुल्का और दिल छू लेने वाला देखना चाहते हैं, तो धड़कपुर लौट आइए। प्राइम वीडियो पर ‘दुपहिया’ का दूसरा सीजन दस्तक दे चुका है और इस बार गांव की गलियों में सिर्फ बाइक चोरी की कहानी नहीं, बल्कि सपनों, बेरोजगारी, सोशल मीडिया, अफवाहों और परीक्षा में धांधली जैसे मुद्दों की भी खूब सवारी कराई गई है।
पहले सीजन में जहां कहानी एक बाइक चोरी के इर्द-गिर्द घूमती थी, वहीं दूसरे सीजन में दायरा बड़ा हो गया है। धड़कपुर वही है, किरदार वही देसी मिजाज वाले हैं, लेकिन इस बार उनके सामने समस्याएं कहीं ज्यादा हैं—और इन्हीं समस्याओं से निकलती है कॉमेडी।
कहानी में इस बार कई रंग
बनवारी झा यानी गजराज राव अपने परिवार के साथ धड़कपुर में रहते हैं। नौकरी नहीं है और घर का खर्च चलाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। उनका बेटा भूगोल झा यानी स्पर्श श्रीवास्तव मुंबई जाकर हीरो बनने का सपना देखता है। फिलहाल उसका मुंबई वाला सपना गांव में ही रील्स बनाकर पूरा करने की कोशिश में है।
कहानी तब नया मोड़ लेती है जब बनवारी की जमीन पर मोबाइल टावर लगाने का प्रस्ताव आता है। बदले में लाखों रुपये और नियमित आमदनी की उम्मीद परिवार के लिए किसी वरदान से कम नहीं। लेकिन गांव में इंटरनेट से मिली आधी-अधूरी जानकारी के बाद अफवाहों का बाजार गर्म हो जाता है।
किसी को लगता है मोबाइल टावर बीमारी फैलाएगा, कोई उसे बुखार का कारण बताता है तो कोई उससे सुनामी तक जोड़ देता है। यहां सीरीज सोशल मीडिया और अधकचरी जानकारी के उस दौर पर मजेदार कटाक्ष करती है, जहां जानकारी कम और राय ज्यादा होती है।
दूसरी तरफ बनवारी की बेटी रोशनी की सगाई टूट चुकी है। अब उसके सामने SSC परीक्षा पास करने की चुनौती है, लेकिन तैयारी लगभग न के बराबर है। कहानी आगे चलकर पेपर लीक जैसे मुद्दे तक पहुंचती है। यह ट्रैक सीरीज को सिर्फ पारिवारिक कॉमेडी न बनाकर मौजूदा सामाजिक माहौल से भी जोड़ देता है।
यानी इस बार ‘दुपहिया’ में परिवार है, बेरोजगारी है, गांव की राजनीति है, अफवाहें हैं, सोशल मीडिया है, परीक्षा का दबाव है और सिस्टम पर हल्का-फुल्का व्यंग्य भी।
गजराज राव और स्पर्श श्रीवास्तव ने संभाली पूरी सवारी
गजराज राव को देसी, आम आदमी वाले किरदारों में देखना हमेशा मजेदार होता है और बनवारी झा के किरदार में भी वह पूरी तरह फिट बैठते हैं। उनके चेहरे के एक्सप्रेशन, बोलने का अंदाज और परिस्थितियों पर प्रतिक्रिया—सीरीज की कॉमेडी को स्वाभाविक बनाए रखते हैं।
लेकिन इस सीजन की सबसे बड़ी ताकत हैं स्पर्श श्रीवास्तव।
भूगोल का किरदार सिर्फ हंसाता नहीं, बल्कि उसके सपने, पिता की उम्मीदें और अपनी पहचान बनाने की बेचैनी भी दिखाई देती है। स्पर्श ने कॉमेडी और इमोशन के बीच शानदार संतुलन बनाया है। लड़की बनकर डांस करने वाले सीन हों या अपने अंदाज में मजेदार जवाब देने वाले पल—वह लगातार स्क्रीन पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं।
‘लापता लेडीज’ और ‘जमतारा: सबका नंबर आएगा’ के बाद स्पर्श एक बार फिर दिखाते हैं कि वह सिर्फ एक ही तरह के किरदार तक सीमित रहने वाले अभिनेता नहीं हैं।
निरहुआ की मौजूदगी भी सीरीज में देसी रंग बढ़ाती है। वहीं रेणुका शहाणे सरपंच पुष्पलता यादव के किरदार में अच्छी लगती हैं, हालांकि उनके किरदार को थोड़ा और विस्तार मिलता तो मजा बढ़ सकता था।
सोनम नायर का निर्देशन: छोटे गांव की बड़ी कहानी
सीरीज का निर्देशन सोनम नायर ने किया है और वह पहले सीजन की सहजता को बरकरार रखते हुए कहानी का दायरा बढ़ाने में काफी हद तक सफल रहती हैं।
पहले सीजन में कहानी अपेक्षाकृत एक मुद्दे पर केंद्रित थी और उसके किरदारों का भोलापन उसकी सबसे बड़ी खूबी था। दूसरे सीजन में नायर ने उसी दुनिया में कई नए मुद्दे जोड़ दिए हैं। अच्छी बात यह है कि कहानी पूरी तरह बोझिल नहीं होती और सामाजिक मुद्दों को उपदेश की तरह पेश करने के बजाय उन्हें किरदारों और परिस्थितियों के जरिए सामने रखा गया है।
हालांकि कई ट्रैक एक साथ चलने की वजह से कुछ जगहों पर कहानी थोड़ी बिखरी हुई महसूस होती है। कुछ मुद्दों को और गहराई मिल सकती थी। लेकिन सीरीज का उद्देश्य गंभीर सामाजिक विमर्श से ज्यादा देसी मनोरंजन के भीतर इन मुद्दों को छूना है और उस लिहाज से यह काफी हद तक काम करती है।
फाइनल वर्डिक्ट
‘दुपहिया’ सीजन 2 कोई ऐसी सीरीज नहीं है जो आपको हर एपिसोड के बाद सोचने पर मजबूर कर दे। इसकी असली ताकत है इसका देसीपन, किरदारों की मासूमियत और रोजमर्रा की परेशानियों से निकलती कॉमेडी।
कई मुद्दों को एक साथ जोड़ने के बावजूद सीरीज अपनी हल्की-फुल्की पहचान नहीं छोड़ती। अगर आपको छोटे शहर और गांव की पृष्ठभूमि वाली कहानियां पसंद हैं, जिनमें कॉमेडी के साथ परिवार, संघर्ष और सामाजिक मुद्दों की थोड़ी-सी झलक हो, तो ‘दुपहिया’ सीजन 2 इस वीकेंड के लिए एक मजेदार सवारी हो सकती है।
रेटिंग: ⭐⭐⭐½/5
क्यों देखें?
क्योंकि धड़कपुर की सड़कें भले ही देसी हों, लेकिन इस बार वहां की कहानी में आज के भारत की कई असली परेशानियां भी दिखाई देती हैं—हंसी के साथ।
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