“दिल टूटना अपराध नहीं: रिश्तों और कानून की सीमा रेखा खींचता अदालत का फैसला”
न्यायालय ने कहा कि शादी का वादा तभी “झूठा वादा” माना जा सकता है, जब यह साबित हो जाए कि शुरुआत से ही उस वादे के पीछे धोखाधड़ी की मंशा थी और उसे कभी निभाने का इरादा ही नहीं था। लेकिन अगर समय के साथ परिस्थितियां बदल जाएं—जैसे परिवार का विरोध, रिश्ते में मतभेद या मन का बदल जाना—तो इसे आपराधिक इरादा नहीं कहा जा सकता।
कानून दिल टूटने को अपराध नहीं मानता
हाल ही में कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि “कानून दिल टूटने को अपराध नहीं मानता।” यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि आधुनिक रिश्तों, सहमति और कानून के बीच की जटिलताओं को भी उजागर करती है।
मामला उस याचिका से जुड़ा था जिसमें एक व्यक्ति ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी। महिला ने आरोप लगाया था कि उस व्यक्ति ने शादी का झूठा वादा करके उससे शारीरिक संबंध बनाए। यह मामला भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 और 115(2) के तहत दर्ज किया गया था।
इस मामले की सुनवाई करते हुए जज जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने स्पष्ट कहा कि अगर दो वयस्क लंबे समय तक आपसी सहमति से रिश्ते में रहते हैं और बाद में शादी नहीं हो पाती, तो सिर्फ इस वजह से उस रिश्ते को बलात्कार का अपराध नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायत को ध्यान से पढ़ने पर कहीं भी जबरदस्ती, हिंसा या शुरुआत से धोखा देने की मंशा का उल्लेख नहीं है। यह मामला दो साल तक चले लिव-इन रिलेशनशिप का था, जिसमें दोनों ने साथ रहकर एक साझा घरेलू जीवन बिताया और आपसी सहमति से संबंध बनाए।
अदालत ने अपने आदेश में एक बेहद अहम सिद्धांत दोहराया—
रिश्तों का टूटना दुखद हो सकता है, लेकिन हर टूटे हुए रिश्ते को अपराध नहीं बनाया जा सकता।
न्यायालय ने कहा कि शादी का वादा तभी “झूठा वादा” माना जा सकता है, जब यह साबित हो जाए कि शुरुआत से ही उस वादे के पीछे धोखाधड़ी की मंशा थी और उसे कभी निभाने का इरादा ही नहीं था। लेकिन अगर समय के साथ परिस्थितियां बदल जाएं—जैसे परिवार का विरोध, रिश्ते में मतभेद या मन का बदल जाना—तो इसे आपराधिक इरादा नहीं कहा जा सकता।
दरअसल आज के दौर में रिश्तों की प्रकृति भी बदल रही है। लिव-इन रिलेशनशिप, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और भावनात्मक निर्णयों ने सामाजिक ढांचे को नया रूप दिया है। ऐसे में अदालतों के सामने यह चुनौती भी बढ़ गई है कि कौन-सा मामला वास्तव में अपराध है और कौन-सा केवल एक असफल रिश्ता।
इस फैसले में अदालत ने एक और महत्वपूर्ण बात कही—
आपराधिक न्याय प्रणाली को असफल रिश्तों का बदला लेने का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।
यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल के वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें प्रेम संबंध टूटने के बाद आपराधिक मुकदमे दर्ज कराए गए। अदालत ने साफ किया कि कानून का उद्देश्य न्याय देना है, न कि व्यक्तिगत भावनात्मक विवादों को आपराधिक रंग देना।
इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि भी दिलचस्प है। दोनों की मुलाकात आयरलैंड में पढ़ाई के दौरान हुई थी। दोस्ती प्यार में बदली और उन्होंने साथ रहने का फैसला किया। महिला पहले से शादीशुदा थी और उसका तलाक का मामला चल रहा था। लेकिन समय के साथ दोनों के रिश्ते खराब हो गए और भारत लौटने के बाद महिला ने उस व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज करा दिया।
यह फैसला केवल एक केस का निपटारा नहीं है, बल्कि समाज के लिए एक संदेश भी है—
कानून भावनाओं का नहीं, तथ्यों और अपराध की मंशा का फैसला करता है।
दिल टूटना एक मानवीय अनुभव है। यह दर्दनाक जरूर है, लेकिन हर दर्द अपराध नहीं होता।
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