सिनेमा की दुनिया में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जो सिर्फ किरदार नहीं निभाते… वे किरदारों को जीते हैं। नाना पाटेकर उन्हीं विरले कलाकारों में से एक थे।
वह चापलूसी करने वाले इंसान नहीं थे। जो कहना होता था, सीधे कहते थे। जो सुनना जरूरी होता था, वही सुनाते थे। शायद यही वजह थी कि उनके डांटने में भी अपनापन महसूस होता था और उनकी सख्ती के पीछे भी एक गहरा स्नेह दिखाई देता था। शाहरुख ने उन्हें याद करते हुए बताया कि नाना का प्यार जताने का अंदाज भी बिल्कुल अलग था—पहले डांट, फिर गालियां और उन्हीं शब्दों के बीच कहीं एक ऐसा अपनापन, जो दिल तक उतर जाता था।
8 अक्टूबर की सुबह जब नाना पाटेकर के निधन की खबर आई, तो हिंदी और मराठी सिनेमा के साथ करोड़ों दर्शकों के बीच एक ऐसा सन्नाटा छा गया, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। 75 वर्ष की उम्र में गोवा में कार्डियक अरेस्ट के बाद उनका निधन हुआ। डॉक्टरों ने उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन करीब 45 मिनट की CPR के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।
नाना सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे। वे अपनी आवाज, आंखों, चेहरे के भाव और संवादों से पर्दे पर एक अलग ही दुनिया खड़ी कर देते थे। ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अब तक छप्पन’, ‘नटसम्राट’ जैसे किरदारों ने उन्हें भारतीय सिनेमा के उन कलाकारों की कतार में खड़ा किया, जिन्हें किसी स्टारडम की जरूरत नहीं थी—उनका अभिनय ही उनकी पहचान था। उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और पद्मश्री सहित कई सम्मान मिले।
लेकिन नाना की असली खूबसूरती शायद उनके अभिनय से भी आगे थी—उनकी बेबाकी में।
शाहरुख खान ने उन्हें याद करते हुए अपनी पहली मुलाकात का किस्सा साझा किया। शाहरुख के मुताबिक, पहली मुलाकात में झिझक के कारण जब वह अपने बालों से खेलने लगे, तो नाना ने उनका हाथ झटकते हुए कहा—
“हीरो की तरह बाल मत बना… तू तो एक्टर है।”
एक छोटी-सी बात… लेकिन उसमें नाना की पूरी शख्सियत छिपी थी।
वह चापलूसी करने वाले इंसान नहीं थे। जो कहना होता था, सीधे कहते थे। जो सुनना जरूरी होता था, वही सुनाते थे। शायद यही वजह थी कि उनके डांटने में भी अपनापन महसूस होता था और उनकी सख्ती के पीछे भी एक गहरा स्नेह दिखाई देता था। शाहरुख ने उन्हें याद करते हुए बताया कि नाना का प्यार जताने का अंदाज भी बिल्कुल अलग था—पहले डांट, फिर गालियां और उन्हीं शब्दों के बीच कहीं एक ऐसा अपनापन, जो दिल तक उतर जाता था।
नाना पाटेकर के कई संवाद आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
“एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है…”
जैसे संवादों से लेकर उनकी खामोशी तक—उनकी आवाज में एक ऐसी ताकत थी, जिसे सुनते ही पर्दा जीवंत हो उठता था।
लेकिन शायद नाना की जिंदगी का सबसे बड़ा संवाद उनकी फिल्मों में नहीं, उनके जीने के अंदाज में था।
वह दिखावे से दूर रहे। उन्होंने अपने अभिनय से पहचान बनाई, अपनी स्पष्टवादिता से सम्मान पाया और अपने काम से यह साबित किया कि अभिनेता बनने के लिए सिर्फ चेहरा नहीं, आत्मा चाहिए।
आज नाना हमारे बीच नहीं हैं।
लेकिन उनके किरदार हैं।
उनकी आवाज है।
उनकी आंखों की वो तीव्रता है।
उनकी बेबाक हंसी है।
और वे संवाद हैं, जिन्हें आने वाली पीढ़ियां भी दोहराएंगी।
शाहरुख के लिए नाना एक कलाकार से कहीं ज्यादा थे—एक शिक्षक, एक आलोचक, एक दोस्त और एक ऐसा इंसान, जो सामने वाले को उसकी सच्चाई से मिलाने का साहस रखता था।
शायद इसलिए नाना को याद करने का सबसे खूबसूरत तरीका यही है—
नाना साहब, आपने पर्दे पर किरदार निभाए नहीं… उन्हें अमर कर दिया।
आज पर्दा गिर गया है, लेकिन आपका अभिनय खत्म नहीं हुआ।
आपकी आवाज अब भी गूंज रही है… और हमेशा गूंजती रहेगी।
भावपूर्ण श्रद्धांजलि।
ॐ शांति।
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