पति या पत्नी की गुप्त रूप से रिकॉर्डिंग अब मानी जाएगी एक दूसरे के खिलाफ सबूत

हाईकोर्ट के फैसले में कहा गया था कि पत्नी की जानकारी के बिना उसकी टेलीफोन पर बातचीत रिकॉर्ड करना 'याचिकाकर्ता-पत्नी के मौलिक अधिकार, यानी उसकी निजता के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन' है और इसे फैमिली कोर्ट में साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता. दरअसल हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की कार्यवाही से जुड़े एक मामले में हाईकोर्ट ने ये फैसला सुनाया था.

Jul 14, 2025 - 16:56
पति या पत्नी की गुप्त रूप से रिकॉर्डिंग अब मानी जाएगी एक दूसरे के खिलाफ सबूत

सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों को लेकर एक अहम फैसला दिया है. इसके तहत पति या पत्नी की गुप्त रूप से रिकॉर्ड की गई टेलीफोन बातचीत सबूत के तौर पर स्वीकार्य होगी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि फैमिली कोर्ट में इसे सबूत के तौर पर माना जा सकता है. इसके साथ ही सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया है. हाईकोर्ट ने पत्नी की जानकारी के बिना उसकी टेलीफोन बातचीत को रिकॉर्ड करना उसकी निजता के मौलिक अधिकार का 'स्पष्ट उल्लंघन' बताया था. हाईकोर्ट ने कहा था कि इसे फैमिली कोर्ट में सबूत के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता. जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच की तरफ से यह फैसला सुनाया गया है. बेंच ने कहा कि पति या पत्नी की गुप्त रूप से रिकॉर्ड की गई टेलीफोन बातचीत वैवाहिक कार्यवाही में साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य है. बेंच ने कहा, 'कुछ तर्क दिए गए हैं कि इस तरह के साक्ष्य की अनुमति देने से घरेलू सौहार्द और वैवाहिक संबंध खतरे में पड़ सकते हैं क्योंकि इससे पति-पत्नी पर जासूसी को बढ़ावा मिलेगा जिससे साक्ष्य अधिनियम की धारा 122 का उल्लंघन होगा. हमें नहीं लगता कि ऐसा तर्क मान्य है.अगर शादी उस मुकाम पर पहुंच गई है जहां पति-पत्नी सक्रिय रूप से एक-दूसरे पर जासूसी कर रहे हैं तो यह अपने आप में एक टूटे हुए रिश्ते का लक्षण है और उनके बीच विश्वास की कमी को दर्शाता है.' दरअसल यह मामला पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के एक फैसले को चुनौती देने से संबंधित है. हाईकोर्ट के फैसले में कहा गया था कि पत्नी की जानकारी के बिना उसकी टेलीफोन पर बातचीत रिकॉर्ड करना 'याचिकाकर्ता-पत्नी के मौलिक अधिकार, यानी उसकी निजता के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन' है और इसे फैमिली कोर्ट में साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता. दरअसल हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की कार्यवाही से जुड़े एक मामले में हाईकोर्ट ने ये फैसला सुनाया था.

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