रेटिंग: ⭐⭐⭐½/5 - आवारापन 2 रिव्यू: 19 साल बाद फिर लौटा शिवम पंडित का दर्द, इश्क और इंतकाम
जब पर्दे पर इमरान हाशमी की एंट्री होती है और बैकग्राउंड में ‘तो फिर आओ’ की धुन सुनाई देती है, तो यह सिर्फ एक गाना नहीं रह जाता। यह 2007 के उस दौर में वापस लौटने जैसा महसूस होता है। यही फिल्म की सबसे बड़ी समझदारी है। मेकर्स ने पुरानी फिल्म की यादों को सिर्फ दिखाया नहीं, बल्कि उन्हें कहानी की भावनात्मक जरूरत के साथ जोड़ा है। ‘तो फिर आओ’ और ‘तेरा मेरा रिश्ता पुराना’ के नए संस्करण कई भावुक दृश्यों में कहानी के असर को और गहरा करते हैं।
19 साल पहले जब ‘आवारापन’ पर्दे पर आई थी, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि शिवम पंडित का दर्द, उसकी खामोशी और अधूरी मोहब्बत आने वाले वर्षों में एक पूरी पीढ़ी की यादों का हिस्सा बन जाएगी। 2007 का वह दौर, इमरान हाशमी का उदास चेहरा और ‘तो फिर आओ’ जैसे गाने आज भी उन दर्शकों के जेहन में ताजा हैं, जिन्होंने उस दौर को जिया है।
अब लंबे इंतजार के बाद ‘आवारापन 2’ उसी भावनात्मक दुनिया में वापसी करती है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि यह फिल्म कैसी है, बल्कि सवाल यह भी है कि क्या 19 साल बाद शिवम पंडित का जादू पहले जैसा ही असर करता है? जवाब है—काफी हद तक हां।
कहानी: जब शिवम को फिर मिला जीने का मकसद
फिल्म की कहानी शिवम पंडित की उसी टूट चुकी दुनिया से आगे बढ़ती है। अपनी मोहब्बत आलिया को खोने के बाद शिवम अपराध की दुनिया से खुद को दूर कर चुका है। उसकी जिंदगी अब खामोशी, तन्हाई और पुरानी यादों के बीच सिमट गई है।
लेकिन किस्मत उसे एक बार फिर उस मोड़ पर ले आती है, जहां उसके सामने एक मासूम बच्ची आती है। शिवम बच्ची को अनाथालय पहुंचाता है और अपनी पुरानी मोहब्बत की याद में उसका नाम आलिया रख देता है।
शिवम उससे दूर रहने की कोशिश करता है, लेकिन जब बच्ची को गोद लेने वाला परिवार उसे मानव तस्करी के अंतरराष्ट्रीय गिरोह के हवाले कर देता है, तब शिवम के भीतर का पुराना योद्धा फिर जाग उठता है।
अब यह सिर्फ एक बच्ची को बचाने की कहानी नहीं है। यह उस आदमी की कहानी है जिसने एक बार अपना प्यार खोया था और अब दूसरी बार अपनी ‘आलिया’ को खोने के लिए तैयार नहीं है।
यहीं से फिल्म भावनात्मक ड्रामा से निकलकर एक खूंखार क्राइम-एक्शन थ्रिलर में बदल जाती है और शिवम का सफर बैंकॉक तक पहुंचता है।
इमरान हाशमी: फिल्म की जान और सबसे बड़ा आकर्षण
अगर ‘आवारापन 2’ किसी एक चेहरे के दम पर खड़ी है, तो वह इमरान हाशमी हैं।
शिवम पंडित का किरदार उनके व्यक्तित्व के साथ इस तरह जुड़ चुका है कि स्क्रीन पर उनका चेहरा आते ही दर्शक कहानी से पहले उनकी भावनाओं को पढ़ना शुरू कर देते हैं।
बढ़ी हुई दाढ़ी, लंबे बाल, उदास आंखें, कम संवाद और चेहरे पर जमा हुआ दर्द—इमरान ने शिवम को सिर्फ निभाया नहीं है, बल्कि उसे दोबारा जिया है।
उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि कई जगह वह बिना संवाद बोले ही पूरा दृश्य अपने नाम कर लेते हैं। उनकी चुप्पी में गुस्सा भी है, दर्द भी है और अधूरी मोहब्बत की वह टीस भी, जो किरदार को आम एक्शन हीरो से बिल्कुल अलग बनाती है।
‘आवारापन 2’ देखते हुए साफ महसूस होता है कि शिवम पंडित का किरदार इमरान हाशमी के करियर के सबसे यादगार किरदारों में क्यों गिना जाता है।
दिशा पाटनी ने चौंकाया, विलेन ने पैदा की बेचैनी
दिशा पाटनी फिल्म में जारा के किरदार में नजर आती हैं। शुरुआत में लगता है कि उनका रोल सीमित होगा, लेकिन कहानी आगे बढ़ने के साथ उन्हें पर्याप्त स्पेस मिलता है। कुछ जगह संवाद अदायगी थोड़ी और प्रभावी हो सकती थी, लेकिन उनका किरदार कहानी को भावनात्मक संतुलन देता है।
वहीं पूरन गब्बी जोरावर के रूप में एक अलग तरह के विलेन को सामने लाते हैं। उनका किरदार सनकी, अस्थिर और अप्रत्याशित है। उनकी बॉडी लैंग्वेज और अजीब व्यवहार फिल्म के माहौल में असहजता पैदा करते हैं।
हालांकि उनका किरदार एक बेहद डरावने मास्टरमाइंड की तुलना में ज्यादा ‘साइको’ और विचित्र दिखाई देता है। इसके बावजूद इमरान हाशमी जैसे अभिनेता के सामने अपनी मौजूदगी दर्ज कराना उनकी बड़ी उपलब्धि है।
शबाना आजमी नाफिसा के किरदार में कम स्क्रीन टाइम के बावजूद प्रभाव छोड़ती हैं। वहीं सुविंदर विक्की अपनी परतदार अदाकारी से कहानी में गंभीरता और गहराई जोड़ते हैं।
असली सरप्राइज—नॉस्टैल्जिया
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसका नॉस्टैल्जिया है।
जब पर्दे पर इमरान हाशमी की एंट्री होती है और बैकग्राउंड में ‘तो फिर आओ’ की धुन सुनाई देती है, तो यह सिर्फ एक गाना नहीं रह जाता। यह 2007 के उस दौर में वापस लौटने जैसा महसूस होता है।
यही फिल्म की सबसे बड़ी समझदारी है। मेकर्स ने पुरानी फिल्म की यादों को सिर्फ दिखाया नहीं, बल्कि उन्हें कहानी की भावनात्मक जरूरत के साथ जोड़ा है।
‘तो फिर आओ’ और ‘तेरा मेरा रिश्ता पुराना’ के नए संस्करण कई भावुक दृश्यों में कहानी के असर को और गहरा करते हैं।
नए ट्रैक ‘ये आवारापन’, ‘वे जुनून’ और ‘पिया घर आया’ भी फिल्म के मूड के साथ अच्छी तरह बैठते हैं।
संगीत यहां सिर्फ मनोरंजन नहीं है—यह शिवम की भावनाओं की आवाज बन जाता है।
एक्शन में भी है इमोशन
‘आवारापन 2’ का एक्शन सिर्फ गोलियां, मारधाड़ और बदला लेने तक सीमित नहीं है।
शिवम जब लड़ता है तो उसके पीछे एक भावनात्मक वजह होती है। हर मुकाबला उसके अंदर दबे दर्द को बाहर निकालता है।
यही वजह है कि फिल्म के कई एक्शन सीक्वेंस दर्शकों को सिर्फ रोमांचित नहीं करते, बल्कि शिवम की बेचैनी भी महसूस कराते हैं।
फिल्म का डार्क विजुअल टोन, क्राइम की दुनिया और बैंकॉक की लोकेशन मिलकर कहानी को एक अलग सिनेमाई माहौल देते हैं।
निर्देशन: पुरानी आत्मा, नई कहानी
नितिन कक्कड़ ने सबसे बड़ा जोखिम यह लिया है कि उन्होंने फिल्म को सिर्फ पहली ‘आवारापन’ की कॉपी नहीं बनाया।
वह जानते हैं कि दर्शक सिर्फ पुराने गाने और इमरान हाशमी को देखने नहीं आए हैं। उन्हें शिवम की कहानी का अगला अध्याय भी चाहिए।
इसलिए फिल्म में पुरानी यादों के साथ एक नई कहानी रखी गई है। यही वजह है कि यह सीक्वल पूरी तरह अतीत के सहारे खड़ा नजर नहीं आता।
हालांकि कुछ जगह स्क्रीनप्ले की रफ्तार कमजोर पड़ती है और इंटरवल के बाद कहानी थोड़ी खिंची हुई महसूस होती है।
फिल्म की सबसे बड़ी खूबियां
इमरान हाशमी का अभिनय फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। इसके साथ पुराने गानों का शानदार इस्तेमाल, डार्क वातावरण, भावनात्मक एक्शन और मजबूत सपोर्टिंग कास्ट कहानी को प्रभावी बनाते हैं।
सबसे खास बात यह है कि फिल्म अपने जॉनर को लेकर भ्रमित नहीं होती। यह रोमांस, दर्द, क्राइम, एक्शन और नॉस्टैल्जिया—इन सभी को एक ही दुनिया में पिरोने की कोशिश करती है।
कहां कमजोर पड़ती है ‘आवारापन 2’?
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी भी कहीं न कहीं उसकी पहली फिल्म से जुड़ी है।
जिस दर्शक ने 2007 की ‘आवारापन’ नहीं देखी है, उसके लिए शिवम का भावनात्मक सफर उतना प्रभावशाली नहीं हो सकता।
इसके अलावा मानव तस्करी वाला ट्रैक आगे बढ़ने के बाद कहानी के कई मोड़ अनुमानित लगने लगते हैं। इंटरवल के बाद कुछ हिस्सों में फिल्म की गति भी धीमी पड़ती है।
विलेन का किरदार भी जितना भय पैदा कर सकता था, उतना पूरी तरह नहीं कर पाता।
फाइनल वर्डिक्ट: शिवम पंडित अभी खत्म नहीं हुआ
‘आवारापन 2’ परफेक्ट फिल्म नहीं है, लेकिन यह एक ईमानदार सीक्वल जरूर है।
यह फिल्म उन दर्शकों के लिए सबसे ज्यादा खास है, जिन्होंने 2007 में शिवम पंडित को पहली बार देखा था और उसके दर्द को अपने भीतर महसूस किया था।
19 साल बाद इमरान हाशमी उसी किरदार में लौटते हैं—उसी खामोशी के साथ, उसी दर्द के साथ और उसी अधूरी मोहब्बत की परछाईं के साथ। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार शिवम के पास खोने के लिए सिर्फ अपनी मोहब्बत नहीं, बल्कि बचाने के लिए एक मासूम जिंदगी भी है।
कुछ कमजोर पटकथा वाले हिस्सों और अनुमानित मोड़ों के बावजूद फिल्म अपने इमोशनल हिस्से में दिल जीत लेती है।
और जब सिनेमाघर में ‘तो फिर आओ’ की धुन गूंजती है, इमरान हाशमी का चेहरा स्क्रीन पर आता है और शिवम पंडित फिर से अपनी दुनिया में लौटता है, तब एक बात साफ हो जाती है—
कुछ किरदार वक्त के साथ पुराने नहीं होते, वे सिर्फ यादों में और गहरे उतर जाते हैं।
‘आवारापन 2’ उन्हीं किरदारों में से एक—शिवम पंडित—की दर्द भरी, खूनी और भावुक वापसी है।
⭐ अंतिम रेटिंग: 3.5/5
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