अहंकार, सत्ता-भक्ति और सनसनी से ऊपर उठकर पत्रकारिता को फिर से जनता का विश्वास जीतना होगा। मीडिया को अब आत्ममंथन करना ही होगा

आज मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसकी विश्वसनीयता है। दर्शक और पाठक समाचार चाहते हैं, लेकिन पक्षपातपूर्ण या अधूरी जानकारी नहीं। जब किसी महत्वपूर्ण जनआंदोलन को शुरुआती दिनों में पर्याप्त स्थान नहीं मिलता और बाद में वही घटना राष्ट्रीय बहस बन जाती है, तब स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं कि समाचारों का चयन पत्रकारिता के आधार पर हो रहा है या किसी अन्य दबाव के कारण। व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा, टीआरपी की होड़, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सरकारी विज्ञापनों पर बढ़ती निर्भरता ने भी मीडिया की स्वतंत्रता को प्रभावित किया है। ऐसे माहौल में निष्पक्ष पत्रकारिता करना कठिन अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं। आज भी अनेक पत्रकार सीमित संसाधनों के बावजूद तथ्य आधारित, साहसी और जनपक्षीय रिपोर्टिंग कर रहे हैं। यही पत्रकारिता समाज का विश्वास बचाए हुए है।

Jul 31, 2026 - 18:37
अहंकार, सत्ता-भक्ति और सनसनी से ऊपर उठकर पत्रकारिता को फिर से जनता का विश्वास जीतना होगा। मीडिया को अब आत्ममंथन करना ही होगा

हेडलाइन- मीड़िया को जंतर पर युवाओं के आंदोलन को गहाई से समझना होगा! अंहकार और चापलूसी छोड़ अब मीड़िया को जरूरत है आत्ममंथन की 
जंतर-मंतर का संदेश: मीडिया को अब आत्ममंथन करना ही होगा

Headline - Media has to understand the movement of youth on Jantar! Let go of arrogance and flattery, now the media is needed The Message of Self-Realization: The media needs to introspect now.

Rising above arrogance, power-devotion and sensationalism, journalism has to win the trust of the people again.

दिल्ली के जंतर-मंतर पर विद्यार्थियों और युवाओं का आंदोलन केवल एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित घटना नहीं था। यह आंदोलन देश के लोकतंत्र, शिक्षा व्यवस्था और सबसे बढ़कर मीडिया की विश्वसनीयता पर उठे गंभीर सवालों का प्रतीक बन गया। आंदोलन समाप्त हो सकता है, लेकिन उसके दौरान उठी आवाज़ें लंबे समय तक भारतीय लोकतंत्र और पत्रकारिता को झकझोरती रहेंगी।

इस आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि बड़ी संख्या में युवाओं ने मुख्यधारा के मीडिया के प्रति अपना गहरा असंतोष व्यक्त किया। यह असंतोष किसी एक चैनल या पत्रकार तक सीमित नहीं था, बल्कि उस पत्रकारिता के खिलाफ था जिस पर लगातार सत्ता के पक्ष में खड़े होने, जनसरोकारों की अनदेखी करने और असुविधाजनक सवालों से बचने के आरोप लगते रहे हैं।

निस्संदेह, किसी भी पत्रकार पर शारीरिक हमला लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है और इसका समर्थन नहीं किया जा सकता। पत्रकारों की सुरक्षा उतनी ही आवश्यक है जितनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। लेकिन इस घटना के पीछे छिपे संदेश को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यदि समाज का एक बड़ा वर्ग मीडिया पर भरोसा खोने लगे, तो यह केवल मीडिया का नहीं बल्कि पूरे लोकतंत्र का संकट बन जाता है।

पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता का प्रचार करना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना है। लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ इसलिए कहा जाता है क्योंकि उसकी भूमिका जनता और सरकार के बीच एक निष्पक्ष प्रहरी की होती है। जब मीडिया सत्ता से कठिन प्रश्न पूछना छोड़ देता है और केवल उसकी उपलब्धियों का प्रसार करने लगता है, तब उसकी विश्वसनीयता धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है।

भारतीय पत्रकारिता का इतिहास जनसेवा, स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ा रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान समाचार पत्र किसी व्यापारिक संस्था से अधिक एक जनआंदोलन का हिस्सा थे। उनका उद्देश्य समाज को जागरूक करना और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना था। समय के साथ मीडिया का विस्तार हुआ, तकनीक बदली और व्यवसाय भी बढ़ा, लेकिन इसी दौर में बाज़ार, विज्ञापन और राजनीतिक प्रभाव ने पत्रकारिता की प्राथमिकताओं को भी प्रभावित किया।

आज मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसकी विश्वसनीयता है। दर्शक और पाठक समाचार चाहते हैं, लेकिन पक्षपातपूर्ण या अधूरी जानकारी नहीं। जब किसी महत्वपूर्ण जनआंदोलन को शुरुआती दिनों में पर्याप्त स्थान नहीं मिलता और बाद में वही घटना राष्ट्रीय बहस बन जाती है, तब स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं कि समाचारों का चयन पत्रकारिता के आधार पर हो रहा है या किसी अन्य दबाव के कारण।

व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा, टीआरपी की होड़, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सरकारी विज्ञापनों पर बढ़ती निर्भरता ने भी मीडिया की स्वतंत्रता को प्रभावित किया है। ऐसे माहौल में निष्पक्ष पत्रकारिता करना कठिन अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं। आज भी अनेक पत्रकार सीमित संसाधनों के बावजूद तथ्य आधारित, साहसी और जनपक्षीय रिपोर्टिंग कर रहे हैं। यही पत्रकारिता समाज का विश्वास बचाए हुए है।

डिजिटल मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारों की बढ़ती लोकप्रियता भी इसी परिवर्तन का संकेत है। लोग अब केवल बड़े चैनलों पर निर्भर नहीं हैं। वे अनेक स्रोतों से जानकारी लेकर स्वयं सत्य की पड़ताल करना चाहते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि पारंपरिक मीडिया की आवश्यकता समाप्त हो गई है, बल्कि यह कि उसे अपने काम करने के तरीके पर गंभीरता से विचार करना होगा।

मीडिया को यह समझना होगा कि उसकी सबसे बड़ी पूंजी सरकारी विज्ञापन, टीआरपी या राजनीतिक निकटता नहीं, बल्कि जनता का विश्वास है। यदि यह विश्वास एक बार खो गया तो उसे वापस पाना अत्यंत कठिन होगा। पत्रकारिता की प्रतिष्ठा केवल बड़े स्टूडियो, चमकदार ग्राफिक्स या ऊँची आवाज़ वाली बहसों से नहीं बनती; वह बनती है तथ्य, निष्पक्षता, ईमानदारी और साहस से।

जंतर-मंतर का आंदोलन मीडिया के लिए एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी। चेतावनी इसलिए कि जनता अब सवाल पूछ रही है। अवसर इसलिए कि अभी भी समय है अपनी दिशा सुधारने का। यदि मीडिया सत्ता, बाज़ार और वैचारिक आग्रहों से ऊपर उठकर जनता के प्रति अपनी जवाबदेही को सर्वोच्च स्थान दे, तो वह खोया हुआ विश्वास फिर से अर्जित कर सकता है।

लोकतंत्र में मजबूत सरकार जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक मजबूत और स्वतंत्र पत्रकारिता भी है। इसलिए आज सबसे अधिक आवश्यकता किसी बहस, बचाव या आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि आत्ममंथन की है। पत्रकारिता का भविष्य उसी दिन सुरक्षित होगा, जिस दिन मीडिया फिर से सत्ता की नहीं, सत्य की पहरेदारी को अपना सबसे बड़ा धर्म मान लेगा।

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