कॉकरोच से हाथी तक… भारत की राजनीति में जानवरों वाले चुनाव चिन्हों की दिलचस्प कहानी

अब नए दलों को नहीं मिलेगा जानवरों का चिन्ह अब सवाल यह उठता है कि क्या भविष्य में किसी नई पार्टी को ‘कॉकरोच’, ‘ड्रैगन’ या किसी अन्य जीव का चुनाव चिन्ह मिल सकता है? जवाब है—नहीं। भारत निर्वाचन आयोग ने नए राजनीतिक दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के लिए जानवरों और पक्षियों वाले चुनाव चिन्हों पर रोक लगा दी है। इसकी सबसे बड़ी वजह पशु क्रूरता से जुड़े मामले रहे। चुनावी प्रचार के दौरान कई बार असली जानवरों को रैलियों में घुमाने, धूप में रखने और उनके दुरुपयोग की शिकायतें सामने आई थीं। पशु अधिकार संगठनों के दबाव के बाद आयोग ने नियम बदल दिए। पुराने दलों को मिली कानूनी छूट

May 22, 2026 - 16:33
कॉकरोच से हाथी तक… भारत की राजनीति में जानवरों वाले चुनाव चिन्हों की दिलचस्प कहानी

कॉकरोच से हाथी तक… भारत की राजनीति में जानवरों वाले चुनाव चिन्हों की दिलचस्प कहानी
सोशल मीडिया पर इन दिनों ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) खूब सुर्खियां बटोर रही है। अमेरिका के बोस्टन से शुरू हुई यह वर्चुअल पार्टी अपने व्यंग्यात्मक अंदाज और सरकार-विरोधी पोस्ट्स के चलते इंस्टाग्राम पर तेजी से वायरल हुई। लेकिन इस अजीबोगरीब नाम ने लोगों के मन में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया—क्या भारत की राजनीति में भी कभी जानवरों के नाम या उनके प्रतीकों वाली पार्टियां रही हैं?
अगर भारतीय चुनावी इतिहास के पन्ने पलटें, तो जवाब है—हाँ, और सिर्फ रही ही नहीं, बल्कि इन प्रतीकों ने देश की राजनीति की दिशा तक तय की है।
हाथी ने बदली सियासत की तस्वीर
भारतीय राजनीति में जानवरों के प्रतीकों की सबसे मजबूत पहचान ‘हाथी’ से जुड़ी रही है। Bahujan Samaj Party ने हाथी को सिर्फ चुनाव चिह्न नहीं, बल्कि सामाजिक शक्ति और बहुजन आंदोलन का प्रतीक बना दिया। मायावती के नेतृत्व में यह निशान देशभर में करोड़ों लोगों की राजनीतिक पहचान बन गया।
दिलचस्प बात यह है कि पूर्वोत्तर में Asom Gana Parishad भी लंबे समय तक हाथी चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में उतरती रही। यानी एक ही जीव ने अलग-अलग क्षेत्रों में अलग राजनीतिक संदेश दिए।
शेर की दहाड़ और नेताजी की विरासत
हाथी के बाद अगर किसी जीव ने राजनीति में सबसे ज्यादा ताकत का प्रतीक बनाया, तो वह था ‘शेर’। महान स्वतंत्रता सेनानी Subhas Chandra Bose द्वारा स्थापित All India Forward Bloc का चुनाव चिन्ह शेर रहा है।
यह प्रतीक पार्टी की आक्रामक और निडर विचारधारा को दर्शाता है। आज भी यह दल उसी पहचान के साथ चुनावी मैदान में मौजूद है।
कांग्रेस का बैल और गाय-बछड़ा दौर
Indian National Congress का शुरुआती चुनावी सफर भी पशु प्रतीकों से जुड़ा रहा। आजादी के बाद शुरुआती चुनावों में पार्टी का निशान ‘दो बैल’ हुआ करता था, जो ग्रामीण भारत और किसान राजनीति का प्रतिनिधित्व करता था।
बाद में कांग्रेस में विभाजन हुआ और Indira Gandhi के नेतृत्व वाले गुट को ‘गाय और बछड़ा’ चुनाव चिन्ह मिला। उस दौर में यह प्रतीक भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बेहद प्रभावशाली साबित हुआ।
दक्षिण भारत में मुर्गे की राजनीति
जानवरों और पक्षियों वाले चुनाव चिन्हों का असर सिर्फ उत्तर भारत तक सीमित नहीं था। दक्षिण भारत की राजनीति में भी ऐसे प्रतीकों का इस्तेमाल खूब हुआ।
तमिलनाडु की बड़ी पार्टी All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam ने एक दौर में ‘मुर्गा’ चुनाव चिन्ह का इस्तेमाल किया था। हालांकि बाद में चुनाव आयोग की व्यवस्थाओं और राजनीतिक परिस्थितियों के चलते पार्टी को नया प्रतीक अपनाना पड़ा।
अब नए दलों को नहीं मिलेगा जानवरों का चिन्ह
अब सवाल यह उठता है कि क्या भविष्य में किसी नई पार्टी को ‘कॉकरोच’, ‘ड्रैगन’ या किसी अन्य जीव का चुनाव चिन्ह मिल सकता है?
जवाब है—नहीं।
भारत निर्वाचन आयोग ने नए राजनीतिक दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के लिए जानवरों और पक्षियों वाले चुनाव चिन्हों पर रोक लगा दी है। इसकी सबसे बड़ी वजह पशु क्रूरता से जुड़े मामले रहे।
चुनावी प्रचार के दौरान कई बार असली जानवरों को रैलियों में घुमाने, धूप में रखने और उनके दुरुपयोग की शिकायतें सामने आई थीं। पशु अधिकार संगठनों के दबाव के बाद आयोग ने नियम बदल दिए।
पुराने दलों को मिली कानूनी छूट
हालांकि यह प्रतिबंध सिर्फ नए दलों पर लागू होता है। जिन राजनीतिक पार्टियों को दशकों पहले हाथी, शेर जैसे जीवों के प्रतीक आधिकारिक तौर पर मिल चुके हैं, वे आज भी उनका इस्तेमाल कर सकती हैं।
यानी Bahujan Samaj Party, All India Forward Bloc जैसी पार्टियां बिना किसी कानूनी अड़चन के अपने पुराने चुनाव चिन्ह बरकरार रख सकती हैं।
इसलिए सोशल मीडिया पर भले ही ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ ट्रेंड कर रही हो, लेकिन भारतीय लोकतंत्र में अब किसी नए जीव की राजनीतिक एंट्री लगभग नामुमकिन मानी जाती है।

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