BSE शेयर पर संकट के बादल! 3 महीने में ₹30,000 करोड़ मार्केट कैप घटा, ऑप्शंस कारोबार में गिरावट ने बढ़ाई निवेशकों की चिंता

BSE के लिए एक्सपायरी डे बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसके डेरिवेटिव्स कारोबार का बड़ा हिस्सा इसी दिन केंद्रित रहता है। जुलाई में BSE के करीब 72.6% कॉन्ट्रैक्ट्स एक्सपायरी डे पर हुए थे। ऐसे में यदि एक्सपायरी वाले दिन ऑप्शंस ट्रेडिंग कमजोर होती है, तो इसका असर BSE के कुल कारोबार और कमाई पर अपेक्षाकृत ज्यादा पड़ सकता है। BSE के शेयर में पिछले दौर की तेजी के पीछे Sensex ऑप्शंस में लगातार बढ़ती बाजार हिस्सेदारी भी एक महत्वपूर्ण वजह रही है। लेकिन अब यदि इस हिस्सेदारी और कारोबार की ग्रोथ धीमी पड़ती है, तो कंपनी की मौजूदा ऊंची वैल्यूएशन को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

Aug 21, 2026 - 17:51
BSE शेयर पर संकट के बादल! 3 महीने में ₹30,000 करोड़ मार्केट कैप घटा, ऑप्शंस कारोबार में गिरावट ने बढ़ाई निवेशकों की चिंता

भारत के प्रमुख स्टॉक एक्सचेंज BSE के शेयर ने पिछले दो वर्षों में निवेशकों को शानदार रिटर्न दिया था, लेकिन अब इसकी रफ्तार पर ब्रेक लगता नजर आ रहा है। पिछले तीन महीनों में BSE का मार्केट कैप करीब ₹30,000 करोड़ घट गया है। शेयर पर लगातार बिकवाली का दबाव बना हुआ है और बाजार में यह सवाल उठने लगा है कि क्या BSE की तेज ग्रोथ का दौर अब कमजोर पड़ रहा है?

विशेषज्ञों के मुताबिक, BSE के कारोबार के सामने फिलहाल तीन बड़ी चुनौतियां हैं—नया क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS), इंडेक्स ऑप्शंस में घटता कारोबार और ब्रोकर्स के लिए RBI के सख्त बैंक गारंटी नियम। इन तीनों का असर एक्सचेंज के डेरिवेटिव्स कारोबार और भविष्य की कमाई पर पड़ सकता है।

ऑप्शंस कारोबार में आई गिरावट

BSE की कमाई में डेरिवेटिव्स कारोबार, खासकर इंडेक्स ऑप्शंस, की अहम भूमिका है। लेकिन अगस्त में अब तक BSE का औसत दैनिक ऑप्शंस टर्नओवर जुलाई की तुलना में करीब 12% कम रहा है।

ब्रोकरेज फर्म Nuvama के आंकड़ों के मुताबिक, BSE का प्रीमियम टर्नओवर करीब 22.7% घटकर ₹18,100 करोड़ रह गया है। इसके साथ ही ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट्स की संख्या में भी करीब 30.5% की गिरावट दर्ज की गई है।

बाजार विशेषज्ञ इस गिरावट के पीछे नए Closing Auction Session (CAS) को प्रमुख कारणों में से एक मान रहे हैं। इस व्यवस्था में दिन के अंत में शेयर या ऑप्शन की क्लोजिंग कीमत ऑक्शन प्रक्रिया के जरिए तय होती है। इससे खासकर एक्सपायरी के समय ऑप्शंस की कीमतों में होने वाले बदलाव का अनुमान लगाना ट्रेडर्स के लिए पहले की तुलना में मुश्किल हो सकता है।

BSE पर CAS का असर ज्यादा क्यों?

BSE के लिए एक्सपायरी डे बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसके डेरिवेटिव्स कारोबार का बड़ा हिस्सा इसी दिन केंद्रित रहता है।

जुलाई में BSE के करीब 72.6% कॉन्ट्रैक्ट्स एक्सपायरी डे पर हुए थे। ऐसे में यदि एक्सपायरी वाले दिन ऑप्शंस ट्रेडिंग कमजोर होती है, तो इसका असर BSE के कुल कारोबार और कमाई पर अपेक्षाकृत ज्यादा पड़ सकता है।

BSE के शेयर में पिछले दौर की तेजी के पीछे Sensex ऑप्शंस में लगातार बढ़ती बाजार हिस्सेदारी भी एक महत्वपूर्ण वजह रही है। लेकिन अब यदि इस हिस्सेदारी और कारोबार की ग्रोथ धीमी पड़ती है, तो कंपनी की मौजूदा ऊंची वैल्यूएशन को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

ब्रोकरेज ने घटाए कमाई के अनुमान

बदलते कारोबारी माहौल का असर ब्रोकरेज फर्मों के अनुमानों पर भी दिखाई देने लगा है।

Jefferies ने FY27 से FY29 के लिए BSE के EPS अनुमान में करीब 5-12% की कटौती की है। वहीं Nuvama ने FY27 और FY28 के EPS अनुमान को क्रमशः 6.3% और 15% कम किया है।

इसका सीधा मतलब है कि ब्रोकरेज फर्मों को आने वाली तिमाहियों में BSE की कमाई को लेकर पहले की तुलना में कम भरोसा है।

RBI के बैंक गारंटी नियम भी बन सकते हैं चुनौती

BSE के लिए एक और चिंता ब्रोकर्स को लेकर RBI के नए बैंक गारंटी नियम हैं। इन नियमों से ब्रोकर्स के कारोबार और खासकर हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग पर दबाव पड़ने की आशंका है।

Jefferies का अनुमान है कि अगले एक साल में इन बदलावों के कारण प्रीमियम टर्नओवर में 10% तक की कमी आ सकती है। यदि ऐसा होता है तो इसका असर डेरिवेटिव्स वॉल्यूम और अंततः BSE की आय पर पड़ सकता है।

क्या BSE में वापसी की गुंजाइश खत्म हो गई है?

हालांकि BSE की तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। एक्सचेंज के पास कारोबार में सुधार के लिए कई विकल्प मौजूद हैं।

BSE अपनी ऑप्शन फीस बढ़ाकर प्रति ट्रेड कमाई बढ़ाने की कोशिश कर सकता है। इसके अलावा यदि बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ता है, ट्रेडर्स नए CAS सिस्टम के साथ बेहतर तरीके से एडजस्ट होते हैं और ऑक्शन में लिक्विडिटी बढ़ती है, तो ऑप्शंस कारोबार दोबारा मजबूत हो सकता है।

यानी मौजूदा गिरावट को BSE की लंबी अवधि की कहानी का अंत नहीं माना जा सकता। लेकिन निवेशकों के लिए अब केवल पिछले दो वर्षों के शानदार रिटर्न को देखकर शेयर में दांव लगाना जोखिम भरा हो सकता है।

Jefferies और Nuvama ने घटाए टारगेट

BSE के शेयर पर बढ़ते दबाव के बीच ब्रोकरेज फर्मों ने अपने टारगेट प्राइस भी कम किए हैं।

Jefferies ने BSE को 'Underperform' रेटिंग देते हुए अपना टारगेट प्राइस ₹3,520 से घटाकर ₹2,940 कर दिया है।

वहीं Nuvama ने BSE पर 'Hold' रेटिंग बरकरार रखते हुए टारगेट प्राइस ₹4,090 से घटाकर ₹3,240 कर दिया है।

इन संशोधनों से संकेत मिलता है कि ब्रोकरेज फिलहाल BSE के कारोबार में आने वाली चुनौतियों को लेकर सतर्क हैं।

निवेशकों को अब किन चीजों पर नजर रखनी चाहिए?

BSE के निवेशकों के लिए आने वाले महीनों में तीन चीजें सबसे महत्वपूर्ण रहेंगी—इंडेक्स ऑप्शंस का कारोबार, CAS के बाद एक्सपायरी डे की गतिविधियां और कंपनी की वास्तविक कमाई।

अगर BSE ऑप्शंस मार्केट में अपनी हिस्सेदारी बनाए रखता है, ट्रेडिंग वॉल्यूम दोबारा बढ़ता है और CAS का असर समय के साथ कम होता है, तो शेयर में रिकवरी की संभावना बन सकती है। लेकिन अगर ऑप्शंस कारोबार में गिरावट जारी रहती है और ब्रोकर्स पर नए नियमों का असर बढ़ता है, तो BSE की कमाई और वैल्यूएशन दोनों पर दबाव बना रह सकता है।

निवेशकों के लिए बड़ा सवाल

BSE ने बीते वर्षों में जिस तेजी से निवेशकों को रिटर्न दिया, वह निश्चित रूप से आकर्षक रहा है। लेकिन मौजूदा परिस्थितियां बताती हैं कि आगे का प्रदर्शन सिर्फ पुराने रिटर्न के आधार पर तय नहीं होगा।

निवेशकों को अब BSE के ऑप्शंस वॉल्यूम, Sensex डेरिवेटिव्स में बाजार हिस्सेदारी, CAS के प्रभाव, प्रीमियम टर्नओवर और आने वाली तिमाहियों की कमाई पर बारीकी से नजर रखनी होगी।

ऐसे में BSE शेयर में निवेश का फैसला करते समय 'पिछला रिटर्न कितना मिला' से ज्यादा जरूरी यह देखना होगा कि कंपनी की भविष्य की कमाई और डेरिवेटिव्स कारोबार किस दिशा में जा रहा है।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow